लखनऊ उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी मुख्यालय में पूर्व आई ए एस  राकेश वर्मा ने प्रेसवार्ता कर up पुलिस एवं up सरकार पर कसा तंज!

लखनऊ उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी मुख्यालय में पूर्व आई ए एस  राकेश वर्मा ने प्रेसवार्ता को सम्बोधित करते हुए कहा कि असल में, ये सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की टिप्पणी सिर्फ यूपी पुलिस पर नहीं, बल्कि यूपी भाजपा राज की अराजकता पर है। यूपी में अपराधियों और सत्ता का गठजोड़ इतना गहरा है कि दलितों, पीड़ितों, शोषितों, वंचितों को भाजपा राज में अन्याय का दंश झेलना पड़ रहा है। आदित्यनाथ सरकार ने कानून को बेरहमी की खूंटी पर टाँग कर आम जनता के न्याय के अधिकार को रसूखदारों की ठोकरों में डाल दिया है।
अपराध से दहला उत्तर प्रदेश- उत्तर प्रदेश में औसतन हर दिन करीब 9 हत्याएं, 10 हत्या के प्रयास, 9 बलात्कार, 33 अपहरण और 235 हिंसक अपराध हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट-“यूपी पुलिस को ही भंग कर दें।”

30 सितंबर 2026 को जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने एक आपराधिक मामले की जाँच में यूपी पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई।

’  जिस मोटरसाइकिल सवार को शिकायतकर्ता के अनुसार मौके पर पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया, एफ आई आर में उसका नाम दर्ज करने के बजाय मामला “अज्ञात” व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया।
’  सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-“जब व्यक्ति मौके पर पकड़ा गया था तो एफ आई आर में उसका नाम क्यों नहीं लिखा गया? लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे?”
’  अदालत ने पुलिस की जाँच पर सवाल उठाते हुए कहा कि हर चीज में कोई न कोई “एजेंडा” दिखाई देता है।
’  कोर्ट ने कहा कि अगर यूपी पुलिस इसी तरह जाँच करती रही तो सभी जाँचों में सी बी आई को शामिल करने के बारे में सोचना पड़ेगा।
’  पीठ ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा “We might as welldisband the UP Police-“
’  अदालत ने यह भी कहा कि “This nonsense has tostop at some point    .”
’  सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस के हलफनामे को संतोषजनक नहीं माना और नए हलफनामे के साथ संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई में उपस्थित होने का निर्देश दिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट-“पुलिस झूठों का झुंड”

देवरिया के गौरी बाजार थाने में चार लोगों को कथित तौर पर गैरकानूनी हिरासत में रखने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बीते दिनों पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए।
’ चार लोगों को अप्रैल 2026 में अलग-अलग अवधि के लिए थाने में हिरासत में रखने का आरोप लगा।
’ अदालत ने पुलिस से थाने की सीसीटीवी फुटेज माँगी, लेकिन पुलिस ने कैमरा खराब होने की बात कही।
’  एस एच ओ ने स्वीकार किया कि सीसीटीवी खराब होने की General Diary  में कोई एंट्री तक नहीं की गई थी।
’  एसपी ने बताया कि उन्हें सीसीटीवी खराब होने की जानकारी नहीं दी गई थी।
’  पुलिस के जवाबों से असंतुष्ट अदालत ने अधिकारियों के लिए मौखिक रूप से टिप्पणी की।
’ एसपी के माफी माँगने पर कोर्ट ने कहा-“अदालत से माफ़ी मत मांगिए, उन लोगों से माफी मांगिए  जिन्हें हिरासत में रखा गया था।”
’  अदालत ने एस एच ओ  के खिलाफ कार्रवाई पर भी सवाल उठाए और केवल क्राइम ब्रांच में तबादले को पर्याप्त नहीं माना।
’  देवरिया के थानों में सीसीटीवी लगाने के लिए जारी रू 46.46 लाख और काम पूरा हुए बिना एजेंसी को भुगतान किए जाने पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए।
’  अदालत ने चार याचिकाकर्ताओं को कुल रू- 65,000 मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसकी वसूली एस एच ओ के वेतन से करने को कहा।

राकेश वर्मा ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि पुलिस की जांच में लोगों का भरोसा कैसे कायम रहेगा और हाई कोर्ट पुलिस अधिकारियों के बयानों पर सवाल उठा रहा है, तो उत्तर प्रदेश सरकार को बताना चाहिए कि प्रदेश में कानून का राज किसके भरोसे चल रहा है?

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